शनिवार, 1 अगस्त 2026

मऊ : गांवों से गायब हुए झूले और खेतों से खो गई कजरी की मधुर तान।||Mau: The swings have disappeared from the villages and the sweet tune of Kajri has disappeared from the fields.||

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मऊ : 
गांवों से गायब हुए झूले और खेतों से खो गई कजरी की मधुर तान।।
आधुनिकता की चकाचौंध में फीकी पड़ रही सावन की लोक परंपराएं।।
।।देवेन्द्र कुमार।।
दो टूक : एक समय था जब सावन की पहली फुहार पड़ते ही गांवों की गलियां, बाग-बगीचे और खेत-खलिहान कजरी की मधुर स्वर लहरियों से गूंज उठते थे। आम और नीम की डालियों पर झूले पड़ते थे, हाथों में मेहंदी, कलाईयों में हरी चूड़ियां और होठों पर कजरी के बोल होते थे— "पिया मेंहदी मंगा द मोतीझील से, जायके सायकिल से ना..."। लेकिन विकास और आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह समृद्ध लोक परंपरा आज धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है।
पूर्वांचल की पहचान रही कजरी केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, संवेदनाओं और सामाजिक जीवन की आत्मा रही है। धान की रोपाई, तीज, हरियाली उत्सव, मेहंदी, झूला और श्रावणी व्रत-पूजन जैसे हर अवसर पर महिलाएं समूह बनाकर कजरी गाती थीं। घर की दादी-नानी और सास-ननद नई पीढ़ी को यह अमूल्य विरासत सिखाती थीं। यही परंपरा गांवों की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती थी।
कजरी के बोलों में प्रेम, विरह, भक्ति, हास-परिहास और जीवन दर्शन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। "राधा झूल रही मधुबन में...", "बड़ा दरद होला नरमी कलाई में..." जैसे गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक संदेशों के वाहक भी रहे हैं।
बदलते समय के साथ अब गांवों में न झूलों की रौनक बची है और न चौपालों पर कजरी की महफिलें सजती हैं। जहां कभी बारिश की बूंदों के साथ महिलाओं की सामूहिक स्वर लहरियां वातावरण को जीवंत बना देती थीं, वहीं आज अधिकांश लोग मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया की दुनिया में खो गए हैं। खेतों से भी अब कजरी की आवाज सुनाई नहीं देती।
सावन केवल धार्मिक आस्था का महीना नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति का सबसे जीवंत पर्व है। हरियाली तीज, नागपंचमी, रक्षाबंधन, मिट्टी के अखाड़े, मेंहदी, हरी चूड़ियां और लोकगीत इस महीने की सांस्कृतिक पहचान रहे हैं। यदि समय रहते इन लोक परंपराओं के संरक्षण और नई पीढ़ी तक इनके प्रचार-प्रसार का प्रयास नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में कजरी और सावन के झूले केवल बुजुर्गों की यादों और किताबों के पन्नों तक ही सीमित रह जाएंगे।
"लोकगीत केवल गीत नहीं होते, वे हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारी मिट्टी की खुशबू होते हैं। इन्हें बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।"