लखनऊ :
नवयुग कन्या महाविद्यालय में मुंशी प्रेमचंद जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, साहित्य, समाज और राष्ट्र निर्माण में प्रेमचंद के योगदान पर मंथन।।
।।डी एस चौबे (शास्त्री)।।
दो टूक : प्रेमचंद का साहित्य आज भी समाज को आईना दिखाता है, युवाओं के लिए प्रासंगिक है मुंशी प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य के महान कथाकार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, मानवीय मूल्यों और राष्ट्र निर्माण के ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी रचनाएं आज भी नई पीढ़ी को संवेदनशील, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देती हैं।
विस्तार:
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर नवयुग कन्या महाविद्यालय, राजेंद्र नगर के हिंदी विभाग की 'नवज्योतिका' संस्था एवं उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को 'प्रेमचंद का साहित्य एवं जनमानस पर प्रभाव' विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देश के प्रख्यात शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने प्रेमचंद के साहित्य को आज के सामाजिक परिदृश्य में भी पूरी तरह प्रासंगिक बताते हुए युवाओं से उनके साहित्य के गंभीर अध्ययन का आह्वान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इसके बाद अतिथियों का पौधे, अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मान किया गया।
मुख्य वक्ता प्रो. राहुल पांडे (हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने कहा कि प्रेमचंद का मानना था कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला सशक्त उपकरण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपने समय के समाज का गहन अध्ययन कर किसानों, महिलाओं, दलितों, शोषित वर्ग और सांप्रदायिकता जैसी ज्वलंत समस्याओं को अपने साहित्य का केंद्र बनाया। उन्होंने छात्राओं को अमृत राय द्वारा संपादित 'विविध प्रसंग' और 'चिट्ठी-पत्री' जैसी पुस्तकों के अध्ययन की सलाह देते हुए कहा कि आज के दौर में प्रेमचंद के साहित्य के पुनर्पाठ की सबसे अधिक आवश्यकता है।
विशिष्ट वक्ता प्रो. माधुरी यादव (ए.पी. सेन गर्ल्स कॉलेज) ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य तीन शताब्दियों तक फैले सामाजिक बदलावों की चेतना को समेटे हुए दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने एक दर्जन से अधिक उपन्यासों के माध्यम से भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत की। उनके साहित्य के पात्र आज भी समाज में जीवंत नजर आते हैं, जो उनकी लेखनी की कालजयी शक्ति का प्रमाण हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. मंजुला उपाध्याय ने छात्राओं को निरंतर अध्ययन और शोध की संस्कृति अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सत्य को समझने के लिए समाचार पत्रों और शोध पत्रों का नियमित अध्ययन आवश्यक है। पढ़ने-लिखने की आदत ही व्यक्ति के विचारों को परिपक्व बनाती है और प्रत्येक विद्यार्थी के ज्ञान तथा कर्म का अंतिम लक्ष्य 'राष्ट्र प्रथम' होना चाहिए।
प्रख्यात साहित्यकार डॉ. रश्मि शील ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को कल्पना की दुनिया से निकालकर आम जनजीवन की वास्तविकताओं से जोड़ा। उन्होंने बताया कि प्रगतिशील लेखक आंदोलन से पहले ही प्रेमचंद अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की मजबूत नींव रख चुके थे। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी समाज को सोचने और बदलने की प्रेरणा देता है।
संगोष्ठी के दौरान हिंदी विभाग एवं प्रयोजनमूलक हिंदी की छात्राओं ने मुंशी प्रेमचंद के जीवन से जुड़े संस्मरण प्रस्तुत किए तथा उनकी चर्चित कहानी 'बूढ़ी काकी' का प्रभावशाली वाचन कर उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया।
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान से अंजू सिंह एवं हर्ष, काव्योंम फाउंडेशन से प्रशांत, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अंकिता पांडे, डॉ. मेघना यादव, डॉ. अपूर्वा अवस्थी, महाविद्यालय की सभी प्रवक्ताएं, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्राएं उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अंकिता पांडे ने किया, जबकि राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ।
