गौतमबुद्धनगर: शब्दों के बिना भावनाओं की अभिव्यक्ति, मूवमेंट से तनाव पर काबू: फर्स्टवन में विशेष बच्चों ने सीखा खुद से जुड़ना!!
‘ROOTED & RISING’ क्रिएटिव मूवमेंट सेशन में विशेष बच्चों, अभिभावकों और आम लोगों ने लिया हिस्सा, शरीर की भाषा और सांस के जरिए भावनाओं को समझने का किया अभ्यास
दो टूक//नोएडा। आज के दौर में बढ़ता स्क्रीन टाइम, तनाव, अकेलापन और भावनात्मक दबाव बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों के लिए भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे समय में सेक्टर-70 स्थित फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन ने भावनाओं को समझने और तनाव से मुक्त होने के लिए एक अनूठी पहल की। फाउंडेशन में ‘ROOTED & RISING – A Creative Movement Session’ का आयोजन किया गया, जिसमें विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ उनके अभिभावकों और आम लोगों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया।
करीब दो घंटे तक चले इस विशेष सत्र में शब्दों से अधिक शरीर, सांस और हरकतों को संवाद का माध्यम बनाया गया। प्रतिभागियों ने विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से अपनी भावनाओं को पहचानने, उन्हें सहजता से व्यक्त करने और स्वयं के साथ जुड़ने का अनुभव किया। सत्र का संचालन क्रिएटिव मूवमेंट थेरेपिस्ट ऊष्मा ने किया।
‘शरीर पहले से जानता है, जरूरत है उसे सुनने की’
क्रिएटिव मूवमेंट थेरेपिस्ट ऊष्मा ने कहा कि मूव करना सीखना जरूरी नहीं है, क्योंकि हमारा शरीर पहले से ही बहुत कुछ जानता है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम कुछ समय रुककर अपने शरीर की आवाज को सुनें और उसकी प्रतिक्रिया को समझें।
उन्होंने कहा कि क्रिएटिव मूवमेंट का उद्देश्य किसी को डांस सिखाना नहीं, बल्कि शरीर की गतिविधियों, सांस और सहज हरकतों के माध्यम से भावनाओं को पहचानने और व्यक्त करने का अवसर देना है। सत्र के दौरान वार्म-अप, गाइडेड मूवमेंट और समूह गतिविधियों के जरिए बच्चों और अभिभावकों ने आत्म-जागरूकता, भावनात्मक अभिव्यक्ति और आपसी जुड़ाव को महसूस किया।
स्कूल-कॉलेज और सोसाइटियों में भी हों ऐसे सत्र: डॉ. महीपाल सिंह
फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. महीपाल सिंह ने कहा कि आज के समय में बच्चे और युवा इंट्रोवर्जन, गुस्सा, बुलिंग, आत्मविश्वास की कमी और भावनात्मक दबाव जैसी कई चुनौतियों से गुजर रहे हैं। ऐसे में क्रिएटिव मूवमेंट और डांस मूवमेंट एक्टिविटी थेरेपी उन्हें अपनी भावनाओं को सकारात्मक तरीके से व्यक्त करने का माध्यम उपलब्ध करा सकती है।
उन्होंने कहा कि इस तरह की गतिविधियां दिमाग, मांसपेशियों और न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़े पहलुओं पर काम करती हैं और बच्चों को अपनी भावनाओं तथा शारीरिक संकेतों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती हैं। इसका लाभ केवल बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि अभिभावक भी अपने बच्चों के शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल संकेतों को समझने के प्रति अधिक जागरूक हो सकते हैं।
डॉ. महीपाल सिंह ने कहा कि ऐसे रचनात्मक और समावेशी सत्रों को केवल विशेष संस्थानों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों और आवासीय सोसाइटियों में भी नियमित रूप से ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि बच्चों और युवाओं को तनाव प्रबंधन तथा भावनात्मक अभिव्यक्ति के स्वस्थ तरीके मिल सकें।
विशेष बच्चों के साथ अभिभावकों ने भी साझा किया अनुभव
कार्यक्रम में विशेष बच्चों के साथ उनके अभिभावकों ने भी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की। प्रतिभागियों ने महसूस किया कि बिना शब्दों के भी शरीर की गतिविधियों के जरिए भावनाओं को व्यक्त किया जा सकता है। कई प्रतिभागियों ने सत्र को सहज, सकारात्मक और आत्म-जागरूकता बढ़ाने वाला अनुभव बताया।
कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। फर्स्टवन रिहैब फाउंडेशन की ओर से कहा गया कि संस्था भविष्य में भी समावेशिता, मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक जागरूकता और विशेष बच्चों के बेहतर विकास को बढ़ावा देने वाले ऐसे कार्यक्रम आयोजित करती रहेगी।
क्या है क्रिएटिव मूवमेंट थेरेपी?
क्रिएटिव मूवमेंट थेरेपी में डांस, सहज शारीरिक गतिविधियों, हरकतों और सांस के माध्यम से व्यक्ति को अपनी भावनाओं को पहचानने और व्यक्त करने का अवसर दिया जाता है। इसका उद्देश्य तनाव कम करने, आत्म-जागरूकता बढ़ाने और शरीर-मन के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने में सहायता करना है।।
