शुक्रवार, 19 जून 2026

गौतमबुद्धनगर: खेत बचाओ अभियान को मिली नई गति, प्राकृतिक खेती अपनाने का किसानों को मिला मंत्र!!

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गौतमबुद्धनगर: खेत बचाओ अभियान को मिली नई गति, प्राकृतिक खेती अपनाने का किसानों को मिला मंत्र!!

 !!वरिष्ठ संवाददाता देव गुर्जर!!

कृषि विज्ञान केंद्र छौलस में कार्यशाला आयोजित, विधायक तेजपाल नागर और आईसीएआर सदस्य सुषमा सिंह ने किसानों को किया जागरूक

दो टूक//गौतमबुद्धनगर, 18 जून। भारत सरकार एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तत्वावधान में चल रहे राष्ट्रव्यापी "खेत बचाओ अभियान" के अंतर्गत गुरुवार को कृषि विज्ञान केंद्र छौलस, दादरी में प्राकृतिक खेती विषयक एक दिवसीय कृषक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में किसानों को प्राकृतिक खेती की आधुनिक और लाभकारी तकनीकों से अवगत कराया गया तथा रासायनिक खेती से होने वाले नुकसान और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ दादरी विधायक तेजपाल नागर ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से जहां भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है, वहीं खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्राकृतिक खेती किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ का विकल्प प्रदान कर रही है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाकर स्वस्थ, समृद्ध और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था के निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित आईसीएआर की गवर्निंग बोर्ड समिति की सदस्य सुषमा सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल खेती करने की एक पद्धति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और कृषि सुधार का एक समग्र मॉडल है। उन्होंने किसानों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, प्राकृतिक कीटनाशकों और स्थानीय संसाधनों पर आधारित खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से तैयार उत्पादों की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों की आय बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं हैं।

कार्यशाला के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती की अवधारणा, उसके मूल सिद्धांतों तथा वर्तमान कृषि परिदृश्य में उसकी उपयोगिता पर विस्तृत जानकारी दी। विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक खेती उत्पादन लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, जैव विविधता को संरक्षित रखने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को बीज उपचार, जीवामृत निर्माण, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, फसल विविधीकरण, जैविक अपशिष्टों के उपयोग और प्राकृतिक कीट प्रबंधन तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन भी कराया गया। साथ ही प्राकृतिक खेती के सफल मॉडल और प्रेरणादायी अनुभव साझा कर किसानों को नई दिशा देने का प्रयास किया गया।

कार्यशाला में बड़ी संख्या में पहुंचे किसानों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए विशेषज्ञों से प्राकृतिक खेती से जुड़े सवाल पूछे, जिनका वैज्ञानिक आधार पर समाधान किया गया। किसानों ने अपने गांवों में प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार और इसे अपनाने का संकल्प भी लिया।

समापन अवसर पर उप कृषि निदेशक राजीव कुमार ने कहा कि यह कार्यशाला किसानों में प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को प्रोत्साहित करने तथा पर्यावरण अनुकूल और लाभकारी कृषि प्रणाली विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के सफल समापन की घोषणा की।

एक जून से 30 जून तक चल रहे "खेत बचाओ अभियान" के तहत आयोजित यह कार्यशाला किसानों को टिकाऊ कृषि की ओर प्रेरित करने और प्राकृतिक खेती के माध्यम से कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हुई।