सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 13 साल से कोमा में पड़े युवक को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति, गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मिली नई दिशा!!
!!वरिष्ठ संवाददाता देव गुर्जर!!
दो टूक// नई दिल्ली, 11 मार्च 2026।
देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐतिहासिक और संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 13 वर्षों से कोमा में पड़े एक युवक को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानव गरिमा और संवेदनशीलता के प्रश्न को भी नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने एम्स (AIIMS) की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम, जिसमें वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब शामिल हैं, हटाने की अनुमति प्रदान कर दी।
13 साल से कोमा में थे हरीश राणा
जानकारी के अनुसार हरीश राणा वर्ष 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वह यूनिवर्सिटी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें गंभीर सिर की चोट आई और वह कोमा में चले गए। तब से लेकर पिछले 13 वर्षों से वह वेजिटेटिव स्टेट (Vegetative State) में थे और पूरी तरह से मेडिकल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर थे।
एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि हरीश राणा के स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार वह 100 प्रतिशत दिव्यांग अवस्था में थे और लंबे समय से बिस्तर पर पड़े थे।
पिता ने दायर की थी याचिका
हरीश राणा के पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बेटे के लिए गरिमापूर्ण मृत्यु की अनुमति देने की मांग की थी। उन्होंने अदालत से कहा कि इतने लंबे समय से बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है और वह केवल मशीनों के सहारे जीवन जी रहे हैं। ऐसे में उन्हें सम्मानजनक तरीके से विदा होने की अनुमति दी जाए।
‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष 2018 के ‘कॉमन कॉज’ मामले का हवाला दिया। उस ऐतिहासिक निर्णय में अदालत ने कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार (Right to Die with Dignity) भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने चिकित्सा विशेषज्ञों की राय और परिस्थितियों को देखते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति प्रदान की।
समाज और कानून के लिए महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देश में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। यह फैसला उन परिवारों के लिए भी राहत का मार्ग खोल सकता है, जो वर्षों से अपने परिजनों को गंभीर और असाध्य स्थिति में मशीनों के सहारे जीवित देखते हुए मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक संघर्ष से गुजर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मानवता, संवेदनशीलता और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिसने यह स्पष्ट किया है कि जीवन के साथ-साथ गरिमापूर्ण मृत्यु भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार हो सकती है।।
