सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

लखनऊ :चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की कला-कार्यशाला एवं संवाद।||Lucknow:Art workshop and dialogue at the Champawat Saras Corbett Festival 2026.||

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लखनऊ :
चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की कला-कार्यशाला एवं संवाद।
दो टूक : उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरती पर टनकपुर में 18 से 24 फरवरी 2026 तक आयोजित चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 की विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत संपन्न दो दिवसीय कला कार्यशाला (लोक और समकालीन कला) महोत्सव का आकर्षण रही। इस सृजनात्मक आयोजन का समन्वयन प्रख्यात चित्रकार तथा ‘कला दीर्घा’ अंतर्राष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र द्वारा किया गया। उनके मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला में जहाँ सौ से अधिक प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर मधुबनी और समकालीन कला की बारीकियां सीखीं, वहीं वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्थानीय संस्कृति के महत्त्व पर सार्थक संवाद हुआ। 
विस्तार :
सृजनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा कला महोत्सव।
कार्यशाला का वातावरण, महोत्सव में हो रही कुमाऊंनी संगीत की रिमझिम बारिश के मध्य, सृजनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। डॉ. मिश्र ने प्रतिभागियों को कला में संवेदना का महत्त्व, स्थानीय सुगंध और ध्वनियों का कला सृजन में बहुविधि सार्थक प्रयोग, रंगों के संतुलन, रेखाओं की सटीकता, विषय चयन की संवेदनशीलता, संरचना की वैज्ञानिक समझ तथा अभिव्यक्ति की मौलिकता पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने अपने तीन दशकों के सृजनात्मक अनुभवों को साझा करते हुए यह स्पष्ट किया कि कला केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुशासन, समय प्रबंधन और नैतिक प्रतिबद्धता का समन्वित परिणाम है। उनके प्रेरक उद्बोधन ने युवा प्रतिभागियों में आत्मविश्वास और समर्पण की नई चेतना का संचार किया।
क्रियात्मक सत्रों में प्रतिभागियों को मधुबनी शैली के विभिन्न विषयों और तकनीकों का प्रत्यक्ष अभ्यास कराया गया। लोककला की पारंपरिक रेखाओं और प्रतीकों के साथ-साथ समकालीन चित्रण की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को समझते हुए विद्यार्थियों ने अपनी कल्पनाशक्ति को रंगों के माध्यम से आकार दिया। कार्यशाला के अंत में प्रदर्शित कलाकृतियाँ प्रतिभागियों की सृजनात्मक प्रगति और सौंदर्यबोध की साक्षी बनीं जिनकी उपस्थित जनों ने मुक्त कंठ से सराहना की। इस अवसर पर डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के कलाचार्य डॉ अवधेश मिश्र द्वारा उत्तराखण्ड की पारंपरिक ऐपण कला सहित देश की विविध लोक शैलियों के सांस्कृतिक महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को रंग संयोजन और रेखांकन की सूक्ष्मताओं से परिचित कराया और यह बताया गया कि स्थानीय कला शैलियों के अभिप्रायों को प्रकारांतर से समकालीन कला और उपयोगी वस्तुओं के प्रयोग में लाकर उसकी ब्रांडिंग की जा सकती है और उसे कलाकारों के व्यक्तिगत विकास के साथ ही अर्थ व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। डॉ मिश्र द्वारा उत्तराखंड के कलाकार आचार्य रणवीर सिंह बिष्ट, आचार्य अवतार सिंह पंवार, मोहम्मद सलीम, पद्मश्री यशोधर मठपाल और आचार्य शेखर जोशी की कला-विशिष्टताओं की चर्चा की गई । इस संवाद ने प्रतिभागियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने की प्रेरणा प्रदान की।
कार्यक्रम के अंतर्गत सुभाष चन्द्र बोस आवासीय विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ एक विशेष संवाद सत्र भी आयोजित किया गया। इस सत्र में विद्यार्थियों को महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन-संघर्ष और राष्ट्रनिष्ठा से प्रेरणा लेने का संदेश दिया गया। आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रीय दायित्वबोध को जीवन में अपनाने का आह्वान करते हुए उन्हें राष्ट्रनिर्माण में सक्रिय सहभागिता के लिए प्रेरित किया गया। विद्यार्थियों को बताया गया कि जीवन में धन और सुख-सुविधाओं से अधिक महत्त्व सृजन का है जो लोक कल्याण की भावना से ओतप्रोत होता है।
डॉ. मिश्र, जो ललित कला अकादेमी पुरस्कार और शिक्षा रत्न सम्मान सहित अनेक महत्त्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित हैं, ने इस कार्यशाला को न केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम तक सीमित किया बल्कि इसे एक वैचारिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप प्रदान किया। कार्यक्रम में मुख्य शिक्षा अधिकारी श्री मेहरबान सिंह बिष्ट, सहायक परियोजना निदेशक विम्मी जोशी, प्रबंधक उद्योग पंकज तिवारी तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों, शिक्षकों और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और अधिक ऊँचाई प्रदान की। डॉ अवधेश मिश्र के सहयोगी डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के ललित कला परास्नातक विद्यार्थी पुलक मिश्र और हिमांशु गुप्ता के साथ कुमाऊँ विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा की छात्रा रही अपर्णा ने कार्यशाला के संयोजन में अति उत्साहपूर्वक सहयोग किया। कार्यक्रम का समापन करते हुए चम्पावत सरस कॉर्बेट महोत्सव 2026 के मंच पर डॉ अवधेश मिश्र को आयोजकों द्वारा महोत्सव का स्मृति चिन्ह, सम्मानपत्र और स्थानीय शिल्पों का उपहार देकर सम्मानित किया गया। सहयोगी कलाकार और प्रतिभागी भी आयोजकों और डॉ अवधेश मिश्र द्वारा पुरस्कार और प्रमाणपत्र पाकर प्रसन्न हुए। यह दो दिवसीय कला कार्यशाला केवल रंगों और रेखाओं का अभ्यास और सृजन मात्र नहीं थी बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक ऐसा सेतु बनी जिसने रचनाकारों के मन में सृजन, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना को सुदृढ़ किया।।