रविवार, 16 नवंबर 2025

लखनऊ :लिव-इन रिलेशनशिप- लज्जाहीन दैहिक सुख (समाजिक चिंतन)।।||Lucknow:Live-in relationships—shameless physical pleasure (social reflection).||

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लखनऊ :
लिव-इन रिलेशनशिप- लज्जाहीन दैहिक सुख (समाजिक चिंतन)।।
लज्जा और मर्यादा समाज की धुरी है।
दो टूक : भारतीय समाज का मूलाधार केवल सामाजिक संरचनाएँ नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत मर्यादाएँ, लज्जा, संयम और दायित्वबोध हैं। यही कारण है कि यहाँ संबंधों को केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे में जब कोई संबंध सामाजिक मान्यता, सांस्कृतिक सौम्यता तथा शास्त्रीय आधार—तीनों से विहीन हो, तो उसका स्वीकार्य होना भारतीय मनीषा में संभव ही नहीं।लिव-इन रिलेशनशिप उसी श्रेणी का एक ऐसा आधुनिक प्रयोग है, जो न्यायालय की दृष्टि से भले ही वैध हो, परंतु भारतीय संस्कृति के दर्पण में वह एक अस्वीकार्य, असंयत और अपवित्र संबंध के रूप में ही उभरता है।
   शास्त्रों में संबंधों की मर्यादा का वर्णन करते हुए उल्लेख मिलता है कि यदि‘धर्माधिष्ठित’ न हों तो ‘काम’ भी पाप बनता है।मनुस्मृति कहती है—
 “धर्मेण कर्माणि समाचरेत्” — अर्थात् हर कर्म धर्मानुकूल हो।
कामसूत्र भी स्पष्ट करता है कि “कामः धर्मेण एव शोभते” — काम तभी उचित है जब वह धर्म के भीतर हो।अतः विवाह-पूर्व अथवा विवाह-बाह्य संबंध शास्त्रों में सर्वत्र निंदित हैं।
सनातन संस्कृति में विवाह के आठ प्रकार  शास्त्रीय व पवित्र व्यवस्था के द्योतक हैं।हिंदू धर्मशास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार वर्णित हैं जिन्हें ब्राह्म, दैव,आरष,प्राजापत्य,गांधर्व,आसुर,राक्षस और पाशुपाल (कुछ ग्रंथों में पिशाच)नामों से जाना जाता है।
इनमें भी गांधर्व विवाह—जहां परस्पर प्रेम प्रमुख हो—वैध माना गया है, पर उसमें भी संस्कार, सामाजिक स्वीकृति, गृहस्थाश्रम का दायित्व अनिवार्य हैं।लिव-इन जैसे दायित्वहीन, असंस्कारित, अस्थायी और शारीरिक-आधारित संबंध का उल्लेख किसी शास्त्र में नहीं मिलता। यह शास्त्रीय मर्यादा के बाहर और धर्मसम्मत विवाह-संरचना के विपरीत है।
सांस्कृतिक शुचिता ‘लज्जा’ और ‘मर्यादा’ समाज की धुरी होती है।लज्जाहीन व्यक्ति कपड़े पहनने के बावजूद भी नंगा ही होता है।महाभारत में कहा गया है—
अलज्जः पुरुषो नष्टः” — जिसके भीतर लज्जा नष्ट हो जाए, उसका पतन निश्चित है।भारतीय संस्कृति में लज्जा केवल संकोच नहीं, एक संरक्षक मूल्य है जो संबंधों को मर्यादित और दायित्वपूर्ण बनाए रखता है।
जब आधुनिकता का पर्याय निर्लज्जता बन जाए, तब मर्यादा की डोर अपने आप टूटने लगती है।
लिव-इन का विचार इसी तूटती हुई मर्यादा की परिणति है, जहाँ संबंध ‘सुविधा’ बन जाते हैं और दायित्व ‘बोझ’।
    यद्यपि लिव इन रिलेशनशिप को न्यायालय ने अपनी मुहर लगाकर आधुनिक युग में नवीन दैहिक सुख की परम्परा को कानूनी मान्यता दे दी है किंतु समाज इस वैधानिकता  को सामाजिक स्वीकार्यता नहीं देता है।सर्वोच्च न्यायालय ने अपने संवैधानिक विवेचन से लिव-इन संबंध को अपराध न मानने का दृष्टिकोण दिया है।परंतु यह भी सत्य है कि कानूनी वैधता सामाजिक व नैतिक वैधता का विकल्प नहीं हो सकती। समाज की संवेदना सदैव इस सिद्धांत पर आधारित रही है—
“यः स्मृत्या न विहितः स धर्मः न भवति”
अर्थात् जो प्राचीन परंपरा और स्मृतियों में निर्दिष्ट नहीं, वह समाज की दृष्टि में धर्म नहीं बन सकता।इसलिए न्यायालय का निर्णय सामाजिक चेतना को न तो बदल सकता है और न बदलना चाहिए।
    वस्तुत: डिजिटल प्लेटफॉर्म को सांस्कृतिक अवक्षय का नया आयाम कहना कदापि गलत नहीं है।आज की पीढ़ी सामाजिक माध्यमों की चकाचौंध में अनजाने ही अश्लील सामग्री, अनियंत्रित रीलों और आवारगी को सामान्य समझने लगी है।‘मनःसंयोगः कामः’—कामसूत्र का यह सिद्धांत बताता है कि दृश्य-प्रेरणा से मन का विचलन स्वाभाविक है।किशोर मन जब डिजिटल प्लेटफार्मों के प्रभाव में आता है, तो उसका विवेक संस्कार नहीं, बल्कि एल्गोरिद्म तय करने लगता है। परिणाम स्वरूप संस्कार नष्ट,इंद्रिय-उन्माद प्रबल, स्वच्छंदता , विवाह-अनुष्ठान बोझ, दायित्व अप्रासंगिक
 और इसके प्रतिफल में इसी वायुमंडल में लिव-इन रिलेशनशिप जैसे सांस्कृतिक विकार जन्म लेते हैं।
   समाजिक संरचना का सत्य स्वरूप यह है कि विवाह दायित्व का संस्कार है, विकल्प नहीं।भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो वंशों, दो परंपराओं और दो संस्कृतियों का मिलन है। गृहस्थाश्रम को धर्मशास्त्रों में श्रेष्ठ कहा गया है—
गृहस्थो धर्ममूलम्”-गृहस्थ ही धर्म की जड़ है।जबकि लिव-इन संबंध— न संस्कार आधारित, न दायित्वनिष्ठ,न सामाजिक मर्यादा-नुकूल, न सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप।इस प्रकार यह सनातन समाज की दृष्टि में केवल स्वच्छंद संबंध, अनुशासनहीन यौनाचार, और पाश्चात्य अंधानुकरण का परिणाम बनकर रह जाता है।
  सार संक्षेप में कहना उचित होगा कि आधुनिकता का स्वरूप मर्यादा के भीतर ही कल्याणकारी है
भारतीय संस्कृति कहती है—
“यत्र धर्मः तत्र जयः”जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
लिव-इन रिलेशनशिप धर्म, समाज, शास्त्र और संस्कृति—चारों से असंगत है।अतः इसे आधुनिकता की परिभाषा मान लेना हमारी सांस्कृतिक स्मृति पर सबसे बड़ा आघात होगा।सभ्य समाज में वही संबंध आदर्श हैं जो— दायित्वपूर्ण हों,मर्यादित हों,शास्त्रसम्मत हों,परिवार और संस्कृति की जड़ों को सुदृढ़ करें,इसके बाहर के हर संबंध क्षणिक हैं, और क्षरणकारी भी।इस लिहाज ने लिव इन को आधुनिक यौनाचार और मॉडर्न वेश्यावृत्ति के रूप में भी परिभाषित किया जाना ज्यादा प्रासंगिक होगा।