प्रयागराज: सीजीएचएस मेरठ रिश्वत मामले में रईस अहमद को हाईकोर्ट से राहत, 30 दिन तक दंडात्मक कार्रवाई पर रोक!!
15 दिन के भीतर डिस्चार्ज प्रार्थना पत्र दाखिल करने की अनुमति, सीबीआई की विशेष अदालत को कानून के अनुसार शीघ्र निर्णय लेने के निर्देश
दो टूक//मेरठ/गाजियाबाद। सीजीएचएस मेरठ से जुड़े कथित 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगने के मामले में आरोपी बनाए गए रईस अहमद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिली है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने याची को गाजियाबाद स्थित विशेष न्यायाधीश, एंटी करप्शन, सीबीआई की अदालत में 15 दिनों के भीतर डिस्चार्ज प्रार्थना पत्र दाखिल करने की अनुमति दी है। हाईकोर्ट ने संबंधित विशेष अदालत को निर्देश दिया है कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद प्रार्थना पत्र पर गुण-दोष के आधार पर कानून के अनुसार शीघ्र निर्णय ले। इसके साथ ही न्यायालय ने अगले 30 दिनों तक याची के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं किए जाने का आदेश दिया है। रईस अहमद की ओर से हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुनील चौधरी ने पक्ष रखा।
आरोपपत्र और समन आदेश को दी गई थी चुनौती
मामला सीजीएचएस मेरठ में कथित तौर पर 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगने से जुड़ा है। रईस अहमद की ओर से दाखिल याचिका में आरोपपत्र तथा अदालत द्वारा जारी संज्ञान/समन आदेश को चुनौती दी गई थी। याची पक्ष का कहना था कि उसे मामले में गलत तरीके से आरोपी बनाया गया है, जबकि उसकी भूमिका कथित रिश्वत की मांग करने या उसे स्वीकार करने में नहीं थी।
याची के अधिवक्ता सुनील चौधरी के अनुसार, रईस अहमद पिछले करीब 25 वर्षों से डॉ. आशीष जैन के संस्थानों—जेएमसी मेडिकल सिटी, हाईफील्ड स्पेशलिटी हॉस्पिटल और जैन मेडिकल स्टोर, मेरठ—में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत रहे हैं। ये संस्थान सीजीएचएस के पैनल में शामिल हैं। अस्पतालों के बिलों के भुगतान और अन्य प्रशासनिक कार्यों के सिलसिले में वह अपने निदेशक डॉ. आशीष जैन के निर्देश पर सीजीएचएस कार्यालय में अधिकारियों से मिलने जाया करते थे।
क्या है पूरा मामला?
याची पक्ष के अनुसार, 8 जुलाई 2025 को सीजीएचएस मेरठ के तत्कालीन एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अजय कुमार और ऑफिस सुपरिंटेंडेंट लवलेश सोलंकी पर अस्पताल के निरीक्षण में कथित रूप से पाई गई कमियों पर कार्रवाई नहीं करने के बदले 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। इस मामले में अस्पताल के कर्मचारी विशाल कुमार की शिकायत पर सीबीआई ने कार्रवाई की थी।
अधिवक्ता के मुताबिक, अस्पताल के निदेशक डॉ. आशीष जैन के निर्देश पर रईस अहमद एक अन्य कर्मचारी और शिकायतकर्ता विशाल कुमार के साथ कथित रिश्वत की पहली किस्त के रूप में पांच लाख रुपये लेकर सीजीएचएस कार्यालय पहुंचे थे। आरोप है कि वहां लवलेश सोलंकी ने उन्हें अगले दिन रकम लेकर आने के लिए कहा। इसके बाद रईस अहमद कथित रकम वाला बैग लेकर वापस लौट रहे थे, तभी रास्ते में सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
याची पक्ष का दावा—रिश्वत की मांग में नहीं थी कोई भूमिका
याची की ओर से अदालत में दलील दी गई कि रईस अहमद कथित अवैध लेन-देन के लाभार्थी नहीं थे, बल्कि अपने निदेशक के निर्देश पर शिकायतकर्ता विशाल कुमार के साथ सीजीएचएस कार्यालय गए थे। अधिवक्ता ने दावा किया कि शिकायतकर्ता विशाल कुमार ने रईस अहमद के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं की थी और न ही डॉ. आशीष जैन तथा विशाल कुमार के बयानों में उन्हें आरोपित किया गया। याची पक्ष ने यह भी कहा कि उनके विरुद्ध रिश्वत मांगने या स्वीकार करने से संबंधित पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं और उन्हें आरोपी के बजाय गवाह बनाया जाना चाहिए था।
हालांकि, ये सभी दलीलें याची पक्ष की ओर से रखी गई हैं। मामले में आरोपों और साक्ष्यों का अंतिम मूल्यांकन संबंधित विशेष अदालत द्वारा किया जाना है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाईकोर्ट में बहस के दौरान अधिवक्ता सुनील चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के नीरज दत्ता बनाम स्टेट और बी. जयराज बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला दिया। याची पक्ष ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने से संबंधित कानूनी आवश्यकताओं को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना जरूरी है। केवल रकम की बरामदगी के आधार पर ही रिश्वत के अपराध में दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि कथित रकम का याची के पास होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसने रिश्वत की मांग की थी या उसे स्वीकार किया था। इन्हीं आधारों पर आरोपपत्र और संज्ञान/समन आदेश को चुनौती दी गई थी।
विशेष सीबीआई अदालत में होगी आगे की सुनवाई
दोनों पक्षों को सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रईस अहमद को 15 दिनों के भीतर संबंधित विशेष सीबीआई अदालत में डिस्चार्ज प्रार्थना पत्र दाखिल करने की अनुमति दी। अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह प्रार्थना पत्र पर कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर शीघ्र निर्णय करे। हाईकोर्ट ने अगले 30 दिनों तक याची के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का आदेश भी दिया। याची पक्ष के अनुसार, इस निर्देश पर सीबीआई की ओर से कोई आपत्ति नहीं की गई।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया। अब मामले में रईस अहमद की ओर से दाखिल किए जाने वाले डिस्चार्ज प्रार्थना पत्र पर संबंधित विशेष सीबीआई अदालत का निर्णय महत्वपूर्ण होगा।
