मऊ :
बाबू जगदेव प्रसाद की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि,सामाजिक न्याय के संघर्ष को किया याद।
‘बिहार के लेनिन’ने शोषितों को दिलाई अधिकार और सत्ता में भागीदारी की आवाज।
।।देवेन्द्र कुशवाहा।।
दो टूक : जनपद मऊ नगर पालिका के इमिलिया स्थित टीपीएस स्कूल में महान क्रांतिकारी एवं सामाजिक न्याय के प्रखर योद्धा अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद जी के 53वें शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने बाबू जगदेव प्रसाद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके संघर्षों एवं विचारों को याद किया।
इस अवसर पर वक्ता बिजय ने कहा कि बाबू जगदेव प्रसाद ने समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके विचार आज भी सामाजिक समानता, शिक्षा, सम्मान और न्याय की दिशा में समाज को प्रेरणा देते हैं।
सामाजिक न्याय, समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले महान समाजवादी चिंतक, पत्रकार एवं जननेता बाबू जगदेव प्रसाद की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर उनके संघर्ष, विचारों और सामाजिक न्याय की राजनीति में योगदान को याद करते हुए उन्हें नमन किया गया। सत्यम सर ने कहा कि बाबू जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को बिहार के तत्कालीन गया जिले के कुर्था क्षेत्र के कुरहारी गांव में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मे जगदेव प्रसाद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और लेखन के माध्यम से सामाजिक असमानता तथा शोषण के खिलाफ जनचेतना पैदा की।
स्वतंत्रता के बाद वे समाजवादी आंदोलन से जुड़े और राजनीति को वंचित समाज की आवाज बनाने का प्रयास किया। 1967 में कुर्था विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होने के बाद उन्होंने बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 1968 में वे बिहार के उपमुख्यमंत्री भी बने। सत्ता में रहते हुए भी उनकी प्राथमिकता सामाजिक रूप से पिछड़े, दलित, गरीब और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना रही।
जगदेव प्रसाद ने 25 अगस्त 1967 को ‘शोषित दल’ का गठन कर वंचित समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने का प्रयास किया। बाद में समाजवादी चिंतक रामस्वरूप वर्मा के साथ वैचारिक साझेदारी के माध्यम से शोषित समाज दल के गठन ने सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी।
उनका प्रसिद्ध उद्घोष—
“सौ में नब्बे शोषित हैं, शोषित ने ललकारा है। धन, धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है।”
वंचित वर्गों की सत्ता और संसाधनों में भागीदारी की उनकी सोच को स्पष्ट करता था। उनका एक अन्य चर्चित नारा “दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा” भी सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को मजबूती से उठाता था।
जगदेव प्रसाद जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और आर्थिक शोषण के प्रखर विरोधी थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को सम्मान, अवसर और सत्ता में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। उनके इसी क्रांतिकारी तेवर और शोषित वर्गों को संगठित करने की क्षमता के कारण उन्हें ‘बिहार का लेनिन’ कहा गया।
आंदोलन के दौरान हुई शहादत
5 सितंबर 1974 को कुर्था में चल रहे आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में बाबू जगदेव प्रसाद की मृत्यु हो गई। उस समय उनकी आयु मात्र 52 वर्ष थी। उनकी शहादत सामाजिक न्याय और वंचितों के अधिकारों के संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय बन गई।
जगदेव प्रसाद की राजनीतिक विरासत आज भी सामाजिक न्याय, समानता, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी की बहस में प्रासंगिक है विचारों ने उत्तर भारत की राजनीति में वंचित वर्गों की भागीदारी के सवाल को मजबूती से सामने रखा।
पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए वक्ता धर्मदेव मौर्या
ने कहा कि बाबू जगदेव प्रसाद का जीवन केवल एक राजनेता की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी और अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष की प्रेरणा है। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब समाज के हर वर्ग को सम्मान, अवसर और निर्णय प्रक्रिया में बराबर की भागीदारी मिले।
बाबू जगदेव प्रसाद की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।
