लखनऊ :
परिवार ने पेश की अनूठी मिसाल,पोती के जन्म पर हुआ सोहर-मंगलाचार, बांटी खुशियां।
●सोशल मीडिया पर वायरल हुआ स्वागत का वीडियो, हर कोई कर रहा सराहना।
दो टूक : आज के आधुनिक दौर में भी जहां समाज का एक बड़ा हिस्सा बेटे की चाहत में बेटियों के जन्म को बोझ मानता है और बहुओं को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, वहीं राजधानी के पीजीआई क्षेत्र से समाज को आईना दिखाती एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। कल्ली कस्बा निवासी एक परिवार ने घर में नन्ही परी (पोती) के आगमन को किसी महाउत्सव की तरह मनाकर यह साबित कर दिया है कि बेटियां ही घर की असली लक्ष्मी होती हैं।
कल्ली कस्बे के रहने वाले सुशील मिश्रा और उनकी पत्नी किरण मिश्रा के घर जब पोती ने जन्म लिया, तो उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं रहा। अस्पताल से जब बहू रेखा मिश्रा अपनी नवजात बेटी को लेकर पहली बार घर लौटीं, तो नजारा किसी बड़े त्योहार जैसा था।
●फूलों से महका आंगन, मंगल गीतों से गूंजा घर।
परिजनों ने बहू और नवजात बेटी के स्वागत के लिए पूरे घर को फूलों और गुब्बारों से दुल्हन की तरह सजाया था। जैसे ही बहू ने घर की दहलीज पर कदम रखा, ढोल-नगाड़ों, सोहर और पारंपरिक मंगल गीतों के बीच उन पर फूलों की बारिश की गई। दादी किरण मिश्रा ने रूढ़िवादी सोच को दरकिनार करते हुए अपनी बहू और पोती की आरती उतारी और उन्हें घर की लक्ष्मी बताते हुए पलक-पावड़े बिछाकर गृह प्रवेश कराया। इस दौरान पूरे परिवार की आंखों में खुशी के आंसू और चेहरों पर गर्व का भाव साफ देखा जा सकता था।
●सोशल मीडिया पर बटोरीं तारीफें, लोग बोले- 'यही है असली बदलाव'।
इस भव्य और भावुक कर देने वाले स्वागत का वीडियो जब सोशल मीडिया पर सामने आया, तो यह देखते ही देखते वायरल हो गया। नेटिजंस और स्थानीय लोग सुशील मिश्रा के परिवार की इस अनूठी पहल की जमकर तारीफ कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे सरकारी नारे तब तक जमीन पर सच नहीं हो सकते, जब तक समाज के हर घर में बेटियों को ऐसा ही सम्मान और अधिकार नहीं मिलता।सुशील व किरण मिश्रा दादा-दादी ने कहा हमारे घर साक्षात लक्ष्मी ने जन्म लिया है। बहू और बेटी में कोई फर्क नहीं होता। आज हमारी बहू ने हमें दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दी है, इसलिए उसका सम्मान राजा-महाराजाओं की तरह होना ही चाहिए। समाज को अब अपनी संकीर्ण सोच बदलनी होगी।"।
●सोच बदलेगी, तभी बदलेगा समाज
कल्ली कस्बे के इस मिश्रा परिवार ने उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है, जो आज भी बेटा-बेटी में भेदभाव करते हैं। यह खबर महज एक परिवार के जश्न की नहीं, बल्कि उस बदलते भारत की सुगबुगाहट है जहां बेटियों के कदमों की आहट से घर उदास नहीं होते, बल्कि सोहर और खुशियों से चहक उठते हैं। वाकई, यह परिवार आज पूरे समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत बन चुका है।
