लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 21 घंटे की बहस के बाद सरकार को झटका!!
दो टूक//नई दिल्ली, 17 अप्रैल 2026: देश की संसदीय राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया, जब महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को लोकसभा में आवश्यक बहुमत नहीं मिल सका। करीब 21 घंटे लंबी चर्चा के बाद हुए मतदान में विधेयक दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया, जिससे केंद्र सरकार को बड़ा झटका लगा।
क्या था विधेयक का प्रावधान?
यह विधेयक महिलाओं को विधायिका में अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा था। इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव भी शामिल था, ताकि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए पर्याप्त सीटें सुनिश्चित की जा सकें।
इसे वर्ष 2023 में पारित हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा था, जिसका उद्देश्य महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देना है।
मतदान का गणित: कहां चूकी सरकार?
सदन में कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया।
- पक्ष में वोट: 298
- विरोध में वोट: 230
संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण इसे पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था।
- आवश्यक वोट: 352
- कमी: 54 वोट
यानी स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद सरकार जरूरी समर्थन जुटाने में नाकाम रही और विधेयक गिर गया।
परिसीमन बना सबसे बड़ा विवाद
विपक्ष ने इस विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे पर किया। विपक्षी दलों का कहना था कि सीटों के पुनर्निर्धारण से कई राज्यों के राजनीतिक संतुलन पर असर पड़ सकता है और इससे प्रतिनिधित्व असमान हो सकता है।
इसी मुद्दे पर कई दलों ने सरकार का साथ नहीं दिया, जिससे सत्ता पक्ष का गणित बिगड़ गया।
लंबी बहस के बाद बदला समीकरण
करीब 21 घंटे चली चर्चा के दौरान सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। शुरुआत में सरकार को उम्मीद थी कि वह सहयोगी दलों के सहारे बहुमत जुटा लेगी, लेकिन अंतिम समय में समर्थन कम पड़ गया।
राजनीतिक मायने और असर
यह घटनाक्रम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
- विपक्ष को बड़ा मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली
- गठबंधन राजनीति की चुनौतियां सामने आईं
- संसद के आगामी सत्रों में टकराव और बढ़ सकता है
अब आगे क्या?
सरकार के सामने अब इस विधेयक को लेकर नई रणनीति बनाने की चुनौती है। माना जा रहा है कि सरकार व्यापक सहमति बनाने, विवादित प्रावधानों में बदलाव करने और फिर से संशोधित विधेयक लाने पर विचार कर सकती है।
निष्कर्ष
महिला आरक्षण से जुड़े इस महत्वपूर्ण विधेयक का लोकसभा में पारित न हो पाना केवल एक विधायी असफलता नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति अनिवार्य है। आने वाले समय में यह मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।।
