मेरठ में CO ब्रह्मपुरी का कथित ‘वीडियोग्राफी बैन’ आदेश वायरल, पुलिस-मीडिया टकराव पर गरमाया माहौल!!
दो टूक// मेरठ। जिले में उस समय प्रशासनिक हलचल तेज हो गई जब ब्रह्मपुरी सर्किल की सीओ का एक कथित ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वायरल ऑडियो में कथित तौर पर कहा गया है कि “मेरे किसी भी थाने के अंदर यदि पत्रकार वीडियोग्राफी करेगा तो तत्काल मुकदमा दर्ज किया जाए।” इस बयान के सामने आने के बाद पुलिस और मीडिया के बीच नए विवाद की स्थिति बन गई है।
बताया जा रहा है कि वायरल ऑडियो में थानों के अंदर पत्रकारों की एंट्री और वीडियो बनाने पर रोक लगाने की बात कही गई है। ऑडियो में यह भी कथित तौर पर कहा गया कि यदि कहीं वीडियोग्राफी होती है तो संबंधित अधिकारी तुरंत कार्रवाई करें। इस कथित आदेश को लेकर पत्रकार संगठनों में रोष है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार बताया जा रहा है।
एसएसपी का बयान
मामले पर अविनाश पाण्डेय, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेरठ ने सफाई देते हुए कहा कि यह टिप्पणी “सिर्फ कुछ पोर्टल संचालकों के संदर्भ में कही गई थी, जो बिना अनुमति थाने में वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर रहे थे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून व्यवस्था और गोपनीयता बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, और किसी भी कार्रवाई का निर्णय कानूनी प्रावधानों के तहत ही लिया जाएगा।
क्या थाना ‘पब्लिक प्लेस’ है?
विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि क्या थाना पूर्णतः सार्वजनिक स्थल माना जाएगा और क्या वहां पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से वीडियोग्राफी का अधिकार है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो प्रेस की स्वतंत्रता का भी आधार है। हालांकि यह अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं है। सुरक्षा, गोपनीयता, जांच प्रक्रिया या संवेदनशील मामलों में प्रशासन सीमित प्रतिबंध लगा सकता है—लेकिन वह प्रतिबंध विधिसम्मत और स्पष्ट आदेश के तहत होना चाहिए।
पत्रकार संगठनों की प्रतिक्रिया
स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि थानों में पारदर्शिता बनाए रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। उनका तर्क है कि यदि किसी विशेष मामले में जांच या गोपनीयता का प्रश्न है तो पुलिस स्पष्ट कारण बताकर रोक लगा सकती है, लेकिन blanket ban (पूर्ण प्रतिबंध) उचित नहीं माना जा सकता।
कुछ पत्रकारों ने इसे “तुगलकी फरमान” बताते हुए कहा कि बिना स्पष्ट कानूनी आधार के केवल मौखिक आदेश पर मुकदमा दर्ज करने की चेतावनी देना मनमानी की श्रेणी में आ सकता है।
कानूनी पहलू
कानून के जानकारों का कहना है कि एफआईआर तभी दर्ज हो सकती है जब भारतीय दंड संहिता या अन्य प्रासंगिक कानून के तहत स्पष्ट अपराध बनता हो। केवल वीडियो बनाना स्वतः अपराध नहीं है, जब तक कि वह किसी प्रतिबंधित, संवेदनशील या न्यायिक रूप से वर्जित क्षेत्र में न हो।
प्रशासनिक हड़कंप
ऑडियो वायरल होने के बाद पुलिस विभाग के भीतर भी चर्चा तेज है। उच्चाधिकारियों द्वारा मामले की आंतरिक समीक्षा किए जाने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल आधिकारिक स्तर पर यह नहीं बताया गया है कि ऑडियो की सत्यता की जांच कराई जाएगी या नहीं।
कानून बनाम आदेश: बहस जारी
यह पूरा मामला एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या मौखिक आदेश संविधान प्रदत्त अधिकारों से ऊपर हो सकते हैं?
लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ माना जाता है, वहीं कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। ऐसे में संतुलन और संवाद ही समाधान का रास्ता माना जा रहा है।
फिलहाल मेरठ में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आने वाले दिनों में प्रशासन की ओर से कोई औपचारिक स्पष्टीकरण या दिशा-निर्देश जारी होते हैं या नहीं, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।।
