गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

राजधानी में गायब होती ज़िंदगियाँ: 15 दिन में 800 से ज्यादा लापता, बच्चों और महिलाओं की बढ़ती संख्या ने बढ़ाई चिंता!!

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राजधानी में गायब होती ज़िंदगियाँ: 15 दिन में 800 से ज्यादा लापता, बच्चों और महिलाओं की बढ़ती संख्या ने बढ़ाई चिंता!!

 !!वरिष्ठ संवाददाता देव गुर्जर!!

नई दिल्ली।
दो टूक// देश की राजधानी दिल्ली में वर्ष 2026 की शुरुआत के साथ ही लापता व्यक्तियों के मामलों में अचानक आई तेज़ बढ़ोतरी ने प्रशासन, समाज और राजनीति—तीनों को झकझोर कर रख दिया है। जनवरी के पहले पंद्रह दिनों में ही 800 से अधिक लोगों के लापता होने के आंकड़ों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में आम नागरिकों के लिए सुरक्षित है।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार 1 जनवरी से 15 जनवरी 2026 के बीच कुल 807 लोग लापता दर्ज किए गए, जिनमें 509 महिलाएं और किशोरियां तथा 191 नाबालिग बच्चे शामिल हैं। औसतन रोज़ाना 54 से अधिक लोगों का गायब होना राजधानी के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। इनमें से 572 लोग अब भी अनट्रेस्ड हैं, जिनकी तलाश पुलिस द्वारा लगातार की जा रही है।

बच्चों की सुरक्षा पर गहराता संकट

लापता मामलों में नाबालिग बच्चों की स्थिति सबसे गंभीर मानी जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 137 बच्चे अब तक नहीं मिल पाए हैं, जबकि कुछ बच्चों को पुलिस की सक्रिय कार्रवाई के बाद परिजनों से मिलाया जा सका है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बच्चों का इस तरह गायब होना समाज के लिए खतरे की घंटी है और इसके पीछे संगठित अपराध, लापरवाही या सामाजिक असुरक्षा जैसे कारणों से इनकार नहीं किया जा सकता।

महिलाओं की बड़ी संख्या ने बढ़ाई चिंता

लापता लोगों में महिलाओं और किशोरियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होने से महिला सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत मामलों का जोड़ नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों, परिवहन व्यवस्था और शहरी निगरानी तंत्र में मौजूद कमजोरियों का संकेत है।

पुलिस का पक्ष

दिल्ली पुलिस ने इन आंकड़ों को लेकर घबराने की आवश्यकता से इनकार किया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, प्रत्येक लापता व्यक्ति के मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। कई मामलों में लोग पारिवारिक विवाद, मानसिक तनाव या स्वेच्छा से घर छोड़ने के कारण लापता दर्ज होते हैं। पुलिस का दावा है कि ZIPNET, तकनीकी निगरानी, विशेष खोज दल और स्थानीय स्तर पर पुलिस-जन सहयोग के माध्यम से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

पुलिस के अनुसार महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में विशेष सतर्कता बरती जा रही है और इन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जा रहा है।

राजनीतिक हलचल तेज

लापता लोगों के बढ़ते आंकड़ों को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे “चिंताजनक और भयावह” बताते हुए सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि राजधानी में इस तरह की स्थिति कानून-व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है।

परिजनों और सामाजिक संगठनों की पीड़ा

कई पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया है कि उन्हें समय पर जानकारी नहीं दी जाती और खोज प्रक्रिया में देरी होती है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि लापता व्यक्ति केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उसके पीछे एक पूरा परिवार, उसका भविष्य और उसकी सुरक्षा जुड़ी होती है। इस तरह के मामलों से नागरिकों का प्रशासन पर भरोसा कमजोर हो रहा है।

विशेषज्ञों की राय

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या के समाधान के लिए केवल आंकड़े जारी करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए AI आधारित पहचान प्रणाली, त्वरित सार्वजनिक अलर्ट, एकीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस और पहले 24 घंटे में सघन खोज अभियान को प्रभावी रूप से लागू करना जरूरी है। साथ ही पुलिस और आम जनता के बीच विश्वास आधारित सहयोग को भी मजबूत करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

राजधानी दिल्ली में इतने बड़े पैमाने पर लोगों का लापता होना किसी भी हाल में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह सिर्फ एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और सुरक्षा संकट है। ज़रूरत है ठोस नीतिगत फैसलों, आधुनिक तकनीक और संवेदनशील प्रशासनिक रवैये की—ताकि राजधानी अपने नागरिकों को यह भरोसा दिला सके कि उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है।।