लखनऊ :
पठन कौशल के विकास में अखबारों की भूमिका : उदयराज मिश्र।।
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दो टूक : शिक्षा के तीनों अभिकरणों - औपचारिक,अनौपचारिक और अन अनौपचारिक,में विद्यार्थियों के अंदर विभिन्न प्रकार की दक्षताओं और कौशलों के विकास मुख्य उद्देश्य होते हैं।जिनमें पठन कौशल सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है,क्योंकि बगैर इस कौशल के विद्यार्थी मात्र श्रवण करके ही कुछ सीख सकता है।इसलिए ज्ञान की पूर्णता और अभिव्यक्ति की सक्षमता हेतु पठन कौशल जीवनपर्यंत अपरिहार्य होता है।कदाचित कहना अनुचित नहीं होगा कि औपचारिक शिक्षक के उपरांत अखबार ही वो शिक्षण सहायक होते हैं,जो एकसाथ अनेक प्रकार के कौशलों के विकास में सहायक होते हैं।अखबार समाचारों के साथ ही साथ विचारों का जो समालोचनात्मक विवरण प्रस्तुत करते हैं,वह नेगेटिव नैरेटिव को पॉजिटिव में बदलता है।जिससे स्वस्थ सामाजिक संरचना फलीभूत होती है।
डिजिटल शोर, रील संस्कृति और क्षणिक सूचनाओं के इस युग में जब पठन का धैर्य क्षीण होता जा रहा है, तब यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि पठन कौशल का सम्यक् विकास कैसे हो? मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाशास्त्रियों के मत इस प्रश्न का एक स्वर में उत्तर देते हैं—नियमित, अर्थपूर्ण और संदर्भयुक्त पठन से। इस संदर्भ में अख़बार एक ऐसा शैक्षिक उपकरण है, जो औपचारिक शिक्षा और जीवन के अनुभवों के बीच सेतु का कार्य करता है।
शिक्षा-मनोविज्ञान के जनक विलियम जेम्स का मानना था कि रुचि ही ध्यान की जननी है। अख़बार इसी रुचि को उद्दीप्त करता है। विद्यार्थी जब अपने आसपास घट रही घटनाओं को पढ़ता है, तो उसका मन स्वाभाविक रूप से पाठ से जुड़ता है। यही संलग्नता पठन कौशल की पहली और अनिवार्य सीढ़ी है।
इसी तरह प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे के अनुसार बालक ज्ञान का निर्माण सक्रिय अंतःक्रिया द्वारा करता है। अख़बार पढ़ते समय विद्यार्थी केवल सूचनाएँ ग्रहण नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने पूर्व ज्ञान से जोड़ता है—तुलना करता है, प्रश्न उठाता है और निष्कर्ष निकालता है। यह प्रक्रिया संरचनावादी अधिगम का सजीव उदाहरण है, जो पठन को यांत्रिक नहीं, बौद्धिक बनाती है।लेव वाइगोत्स्की की निकटवर्ती विकास क्षेत्र की अवधारणा भी अख़बार पठन की उपयोगिता को रेखांकित करती है। शिक्षक या अभिभावक के मार्गदर्शन में संपादकीय, समाचार-विश्लेषण और फीचर पढ़ना विद्यार्थी को उसकी वर्तमान क्षमता से एक स्तर ऊपर ले जाता है। इस साझा पठन से अर्थग्रहण, शब्द-बोध और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित होती है।
शिक्षाशास्त्री जॉन ड्यूई शिक्षा को जीवन से जोड़ने पर बल देते हैं। उनके अनुसार जो ज्ञान जीवन से कटा हो, वह निष्प्राण है। अख़बार इसी कारण पाठ्यपुस्तकों का स्वाभाविक पूरक बनता है। यह कक्षा में पढ़े गए इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र और विज्ञान को समसामयिक संदर्भ प्रदान करता है, जिससे पठन सार्थक अनुभव में परिवर्तित हो जाता है।
भाषा-विकास के संदर्भ में नोम चॉम्स्की की अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि भाषा का अर्जन केवल नियमों से नहीं, बल्कि समृद्ध भाषिक परिवेश से होता है। अख़बार ऐसा ही परिवेश उपलब्ध कराता है—जहाँ विविध शैली, वाक्य-संरचना और शब्दावली निरंतर पाठक के संपर्क में रहती है। इससे पठन कौशल के साथ-साथ लेखन और चिंतन भी पुष्ट होते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में महात्मा गांधी का यह कथन अत्यंत समीचीन है कि “समाचार-पत्र जनता के शिक्षक होते हैं।” यह शिक्षण औपचारिक नहीं, बल्कि सहज और निरंतर होता है। यही निरंतरता पठन को अभ्यास में और अभ्यास को कौशल में रूपांतरित करती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यालयों में अख़बार आधारित पठन गतिविधियों को योजनाबद्ध रूप से स्थान दिया जाए—शीर्षक पढ़ना, समाचार का सार लिखना, संपादकीय पर चर्चा और मत–तथ्य का भेद सिखाना। यह न केवल पठन कौशल को विकसित करेगा, बल्कि विवेकशील नागरिक भी गढ़ेगा।
अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अख़बार पठन केवल भाषा का अभ्यास नहीं, बल्कि मन, मस्तिष्क और समाज—तीनों का संस्कार है। मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाशास्त्रियों की दृष्टि में यही वह मार्ग है, जिससे पठन कौशल यांत्रिकता से निकलकर चेतनशीलता की ओर अग्रसर होता है।
