मंगलवार, 20 जनवरी 2026

गौतमबुद्धनगर: युवराज की मौत और जवाबदेही का सवाल: क्या नोएडा में इंसाफ़ की जगह सिर्फ़ बलि का बकरा तय हुआ?

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गौतमबुद्धनगर: युवराज की मौत और जवाबदेही का सवाल: क्या नोएडा में इंसाफ़ की जगह सिर्फ़ बलि का बकरा तय हुआ?

 !!वरिष्ठ संवाददाता देव गुर्जर!!

दो टूक:: नोएडा के सेक्टर-150 में निर्माणाधीन मॉल के बेसमेंट में डूबकर युवा इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस घटना के बाद नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) डॉ. लोकेश एम को पद से हटाने की कार्रवाई को सरकार ने त्वरित और कड़ा कदम बताया, लेकिन क्या यही इस त्रासदी का न्यायसंगत निष्कर्ष है—यह सवाल अब ज़ोर पकड़ रहा है।

यदि यह माना जाए कि युवराज की मौत के लिए सरकारी कार्रवाई उचित है, तो कुछ बुनियादी प्रश्न स्वतः खड़े होते हैं।
पहला—क्या यह गैर-इरादतन हत्या सीधे तौर पर नोएडा प्राधिकरण की संस्थागत विफलता है?
दूसरा—क्या इस पूरे घटनाक्रम के लिए सीईओ डॉ. लोकेश एम ही अकेले जिम्मेदार थे?
तीसरा—रविवार देर शाम ट्रैफिक सेल में कार्यरत संविदा अवर अभियंता नवीन को सेवा से बर्खास्त कर देने का औचित्य क्या था?
और चौथा—सबसे अहम सवाल यह कि संविदा जेई और सीईओ के बीच की पूरी प्रशासनिक शृंखला आखिर कहां है, जो अब तक किसी कार्रवाई से अछूती क्यों है?

नोएडा प्राधिकरण के इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी सीईओ को किसी दुर्घटना के बाद पद से हटाया गया है। लेखक की राय में, प्राधिकरण पर कार्रवाई बाद में भी की जा सकती थी, लेकिन घटना के तत्काल बाद जिस तरह एकतरफा दंडात्मक कदम उठाए गए, उन्होंने कई संदेह पैदा कर दिए हैं।

इस पूरे मामले में कमिश्नरेट पुलिस, दमकल विभाग और राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) की भूमिका भी गंभीर सवालों के घेरे में है। ये तीनों एजेंसियां उस समय मौके पर मौजूद थीं, जब युवराज जीवित था। इसके बावजूद एक युवा को ठंडे पानी, खुले बेसमेंट के खंभों और भय के बीच डूबने के लिए छोड़ दिया गया।
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के एक अधिकारी की टिप्पणी इस विफलता को और उजागर करती है—“यदि यह हादसा किसी गांव में होता, तो ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर युवक को बचा लेते।” यह तुलना प्रशासनिक दावों पर करारा प्रहार है। क्या आधुनिक संसाधनों से लैस पुलिस, दमकल और SDRF के जवान अप्रशिक्षित ग्रामीणों से भी कम सक्षम हैं?

एक जीवित इंसान को आंखों के सामने डूबने देना केवल पेशेवर लापरवाही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की पराजय है। सवाल यह भी है कि क्या इन बलों को वास्तविक आपदा प्रबंधन सिखाया जाता है या केवल सुरक्षित स्विमिंग पूल तक ही उनका प्रशिक्षण सीमित रह गया है?

जहां तक नोएडा प्राधिकरण की भूमिका का प्रश्न है, यह संस्था आज एक ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है जो फाइलें पीटने और बिल फाड़ने तक सिमट गई है। मामूली फैसलों के लिए भी लखनऊ की मंजूरी जरूरी है। ऐसे में यहां तैनात अधिकारियों की ऊर्जा और निष्ठा सत्ता के केंद्र की ओर अधिक और ज़मीनी जिम्मेदारियों की ओर कम दिखती है। इस ढांचे में कोई भी सीईओ न तो वास्तविक अधिकार दे सकता है, न छीन सकता है—और डॉ. लोकेश एम इस मामले में और भी कमजोर साबित हुए।

नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के कैलेंडर विवाद में मातहत अधिकारी को बलि का बकरा बनाए जाने की मिसाल पहले से मौजूद है। यही परंपरा यहां भी दोहराई गई। संविदा जूनियर इंजीनियरों पर सीईओ की कथित सत्ता चलती है, इसलिए हादसा चाहे जितना बड़ा हो—फंदा छोटा ही बनाया जाता है और उसमें गर्दन अक्सर संविदा जेई की ही फिट बैठती है।

युवराज की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की सामूहिक असफलता का आईना है। सवाल यह नहीं कि किसे हटाया गया, सवाल यह है कि कौन-कौन अब भी जवाबदेही से बाहर है।।