मंगलवार, 20 जनवरी 2026

गौतमबुद्धनगर: हाई-टेक नोएडा के विकास की कड़वी और डरावनी सच्चाई!!

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गौतमबुद्धनगर: हाई-टेक नोएडा के विकास की कड़वी और डरावनी सच्चाई!!

 !!वरिष्ठ संवाददाता देव गुर्जर!!

चार दिन बाद “मौत के कुंड” से निकली युवराज मेहता की कार, सिस्टम की सुस्ती ने छीनी एक और जान

नोएडा / ग्रेटर नोएडा।
दो टूक:: हाई-टेक सिटी, स्मार्ट सिटी और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर के दावों के बीच नोएडा-ग्रेटर नोएडा से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने विकास के दावों की पोल खोलकर रख दी है। 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के मामले में हादसे के करीब 100 घंटे बाद एनडीआरएफ ने उनकी कार को एक पानी से भरे गहरे गड्ढे से बाहर निकाला। यह वही गड्ढा है, जो अब लोगों की ज़ुबान पर “मौत का कुंड” बन चुका है।

➡ हादसे के 5वें दिन युवराज की कार बरामद
कड़ी मशक्कत के बाद एनडीआरएफ ने कार निकाली
16–17 जनवरी की रात हुआ था दर्दनाक हादसा
➡ पानी में डूबने से इंजीनियर की मौके पर ही मौत

कैसे हुआ हादसा

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में 16 जनवरी की रात युवराज मेहता अपनी कार से गुजर रहे थे। रास्ते में निर्माणाधीन मॉल के लिए खोदा गया एक गहरा गड्ढा, जिसमें भारी मात्रा में पानी भरा हुआ था, बिना किसी बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड या सुरक्षा इंतज़ाम के खुला पड़ा था। अंधेरे में कार सीधे उसी गड्ढे में गिर गई और युवराज पानी में डूब गए।

चार दिन तक डूबी रही सच्चाई

हैरान करने वाली बात यह रही कि हादसे के बाद भी युवराज की कार को बाहर निकालने में चार पूरे दिन लग गए। एनडीआरएफ की टीम ने लगातार प्रयासों के बाद कार को गड्ढे से बाहर निकाला और ट्रक में लोड किया। इतने समय तक एक कार का पानी में डूबा रहना, राहत और बचाव व्यवस्था की धीमी गति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

स्मार्ट सिटी के दावों पर बड़ा सवाल

यह घटना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि सिस्टम की लापरवाही और कमजोर निगरानी का नतीजा है। सवाल साफ हैं—

  • खुले और जानलेवा गड्ढे शहर में क्यों छोड़े गए?
  • निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों की निगरानी कौन करेगा?
  • हादसे के बाद भी कार्रवाई और राहत में इतनी देरी क्यों हुई?

जहां एक ओर नोएडा को आधुनिक और सुरक्षित शहर बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर एक आम युवक की जान ऐसे हालात में चली जाना विकास के खोखले दावों को उजागर करता है।

हादसे से पहले चुप्पी, मौत के बाद हलचल

आज की हकीकत यही है—

हादसे से पहले सिस्टम खामोश रहता है, मौत के बाद फाइलें और बयान दौड़ने लगते हैं।

अगर समय रहते सुरक्षा इंतज़ाम किए गए होते, खुले गड्ढों को ढंका गया होता और चेतावनी संकेत लगाए गए होते, तो शायद युवराज मेहता आज ज़िंदा होते।


एक मौत, सिस्टम पर सवाल

युवराज मेहता की मौत महज़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लापरवाह व्यवस्था, प्रशासनिक सुस्ती और ज़मीनी हकीकत से कटे विकास मॉडल की कहानी है। यह घटना चेतावनी है कि अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो ऐसे हादसे दोहराते रहेंगे।

युवराज की मौत ने एक बार फिर साबित कर दिया है—
विकास चाहे जितना हाई-टेक हो, अगर सुरक्षा और जवाबदेही नहीं होगी, तो उसकी कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।।