गुरुवार, 3 सितंबर 2026

लखनऊ:‘पारस’ अंतरराष्ट्रीय कला प्रदर्शनी का समापन, 48 कलाकारों की कलाकृतियों ने बिखेरी विविधता।||Lucknow:The 'Paras' International Art Exhibition concludes, showcasing the diverse work of 48 artists.||

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लखनऊ:
‘पारस’ अंतरराष्ट्रीय कला प्रदर्शनी का समापन, 48 कलाकारों की कलाकृतियों ने बिखेरी विविधता।
दो टूक : लखनऊ में शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका एवं कला स्रोत कलावीथिका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘पारस’ अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला प्रदर्शनी का बुधवार को समापन हुआ। प्रदर्शनी में भारत के अलावा बांग्लादेश और श्रीलंका के कलाकारों ने भी सहभागिता की। तीन देशों के 48 कलाकारों की कलाकृतियों ने कला प्रेमियों को समकालीन कला के विविध रूपों से रूबरू कराया।
विस्तार :
 प्रदर्शनी की संकल्पना भारतीय सांस्कृतिक चेतना में निहित ‘पारस’ प्रतीक पर आधारित रही। जिस तरह पारस के स्पर्श से लौह स्वर्ण में बदलने की मान्यता है, उसी तरह गुरु को वह पारस माना गया जो ज्ञान, अनुभव, संस्कार और स्नेह के जरिए शिष्य की प्रतिभा को निखारकर उसे नई दिशा देता है।
01 सितंबर को प्रख्यात लेखक एवं विद्वान आचार्य सूर्य प्रसाद दीक्षित ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। समापन अवसर पर प्रदर्शनी में चित्रकला, छापाचित्र, सिरामिक, टेक्सटाइल कोलाज, छायाचित्र और बुनाई सहित विभिन्न माध्यमों की कलाकृतियां प्रदर्शित की गईं। अलग-अलग कला शैलियों और माध्यमों के जरिए कलाकारों ने गुरु-शिष्य परंपरा, संस्कृति, लोक-स्मृति और समकालीन संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी।
‘उत्कृष्ट कला सदैव सरल होती है’
प्रदर्शनी का अवलोकन करने के बाद मुख्य अतिथि प्रख्यात लेखक एवं कवि डॉ. सर्वेंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि कला की शिक्षा प्राथमिक स्तर से ही शुरू होनी चाहिए। विद्यार्थियों की रचनात्मक स्वतंत्रता को समझते हुए उन्हें अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। इसके लिए सरकार और समाज को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने कहा—“उत्कृष्ट कला सदैव सरल होती है।”
वहीं आचार्य उमेश वशिष्ठ ने कहा कि कला दीर्घा पत्रिका ने कलाकारों को मंच उपलब्ध कराते हुए 26 वर्षों की लंबी यात्रा पूरी की है। युवा कलाकारों को साथ जोड़कर विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से कला जगत में लगातार योगदान दिया जा रहा है।
तीन देशों के कलाकारों ने बनाया सांस्कृतिक सेतु
‘पारस’ प्रदर्शनी की खासियत भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका के कलाकारों की भागीदारी रही। अलग-अलग भाषाओं, भौगोलिक सीमाओं और सांस्कृतिक अनुभवों के बावजूद गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता ने कलाकारों को एक साझा भावभूमि पर जोड़ा। आयोजकों के मुताबिक प्रदर्शनी ने कला के माध्यम से दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करने का काम किया।
समापन अवसर पर कला स्रोत कलावीथिका के निदेशक अनुराग डीडवाना, कला दीर्घा पत्रिका की प्रकाशक डॉ. लीना मिश्र, संपादक डॉ. अवधेश मिश्र, आचार्य उमेश वशिष्ठ एवं डॉ. सर्वेंद्र विक्रम सिंह ने प्रतिभागी कलाकारों को प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
डॉ. लीना मिश्र ने बताया कि ‘हौसला’, ‘वत्सल’, ‘समर्पण’, ‘ढिबरी’, ‘बसंत’, ‘नॉस्टैल्जिया.25’, ‘चौपाल’, ‘हुलास’, ‘मड़ई’, ‘अरघान’, ‘नैवेद्य’ और ‘पारस’ जैसी प्रदर्शनियों के जरिए कला दीर्घा ने अपनी रचनात्मक गतिविधियों का विस्तार किया है। उन्होंने बताया कि जल्द ही देश के अन्य प्रमुख महानगरों में भी कला गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा।