मऊ:
मीडिया की सुर्खियों में बने रहने की होड़: आखिर लोग क्या-क्या नहीं कर जाते।
देवेन्द्र कुशवाहा की दो टूक ---आज के दौर में सुर्खियों में बने रहना कई लोगों की प्राथमिकता बन गया है। कुछ लोग अपने अच्छे कार्यों, समाज सेवा और सकारात्मक सोच से पहचान बनाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो केवल चर्चा में बने रहने के लिए विवादित बयान, तीखी टिप्पणियां और अनावश्यक आरोप-प्रत्यारोप का सहारा लेते हैं।
कई बार देखा जाता है कि बिना तथ्यों के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, भावनात्मक या भड़काऊ बातें कही जाती हैं, या ऐसे मुद्दों को हवा दी जाती है जिनका उद्देश्य केवल लोगों का ध्यान आकर्षित करना होता है। कुछ समय के लिए ऐसे बयान सोशल मीडिया और समाचारों में जगह तो बना लेते हैं, लेकिन लंबे समय में व्यक्ति की पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, व्यवहार और कार्यों से तय होती है।
लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे शब्दों का चयन करें जो समाज में सकारात्मक संदेश दें, न कि अनावश्यक विवाद पैदा करें। असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे शालीनता, तर्क और तथ्यों के आधार पर व्यक्त करना ही परिपक्वता की पहचान है।
मीडिया का उद्देश्य समाज तक जानकारी पहुँचाना है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति केवल सुर्खियाँ बटोरने के लिए बार-बार विवादित बयान देता है, तो यह चर्चा का विषय तो बन सकता है, पर सम्मान का नहीं। क्षणिक प्रसिद्धि और स्थायी प्रतिष्ठा में बहुत अंतर होता है। सुर्खियाँ कुछ घंटों या दिनों की हो सकती हैं, लेकिन व्यक्ति का आचरण और उसके कार्य वर्षों तक याद रखे जाते हैं।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि लोकप्रियता से अधिक महत्वपूर्ण विश्वसनीयता होती है। समाज में वही व्यक्ति लंबे समय तक सम्मान पाता है, जो अपने विचारों में संयम रखता है, तथ्यों के साथ अपनी बात रखता है और अपने कार्यों से लोगों का विश्वास जीतता है।
सुर्खियाँ बनाना आसान है, लेकिन सम्मान कमाना कठिन।
विवाद कुछ समय की पहचान दे सकते हैं, लेकिन चरित्र और कर्म ही स्थायी पहचान बनाते हैं।
