सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: नोएडा घृणा अपराध जांच में लापरवाही पर यूपी पुलिस को कड़ी फटकार, दो हफ्ते में मांगा पूरा जवाब!!
@!वरिष्ठ संवाददाता देव गुर्जर!!
दो टूक// नई दिल्ली//नोएडा : वर्ष 2021 में नोएडा में सामने आए कथित घृणा अपराध मामले की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी नाराजगी जताई है। अदालत ने जांच अधिकारी के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह न्यायालय के साथ “छुपन-छुपाई” जैसा व्यवहार क्यों कर रहा है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा कि आखिर अब तक प्राथमिकी (FIR) में भारतीय दंड संहिता की धारा 153-बी क्यों नहीं जोड़ी गई। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि पहले की सुनवाई में यह संकेत दिया जा चुका है कि इस मामले में धारा 153-बी और 295-ए दोनों लागू होती हैं।
अदालत की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने सख्त लहजे में कहा,
“आपके जांच अधिकारी इस अदालत के साथ छुपन-छुपाई क्यों खेल रहे हैं?”
अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से जवाब मांगते हुए कहा कि अनुपालन हलफनामे से वह संतुष्ट नहीं है। हालांकि, उनके अनुरोध पर अदालत ने अंतिम मौका देते हुए दो सप्ताह का समय दिया और स्पष्ट किया कि पूर्ण अनुपालन नहीं होने पर सख्त कार्रवाई हो सकती है।
क्या है मामला
यह पूरा मामला जुलाई 2021 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक वरिष्ठ नागरिक ने आरोप लगाया कि उसे उसकी “धार्मिक पहचान” के आधार पर अपमानित और प्रताड़ित किया गया। याचिका के अनुसार, पीड़ित पर हमला किया गया और उसकी दाढ़ी व कथित मुस्लिम पहचान को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की गईं।
याचिकाकर्ता ने अदालत से निष्पक्ष जांच, उचित धाराओं में मुकदमा दर्ज करने और संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
किन धाराओं पर विवाद
- धारा 153-बी: राष्ट्रीय एकता के खिलाफ बयान या दावे
- धारा 295-ए: जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले कृत्य
अदालत ने कहा कि शिकायत के तथ्यों से इन धाराओं के तत्व स्पष्ट रूप से बनते हैं, इसके बावजूद इन्हें FIR में शामिल नहीं किया गया—जो जांच की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
आगे की कार्रवाई
राज्य सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया है कि जांच में आवश्यक धाराएं जोड़ी जाएंगी और आगे की जांच भी की जाएगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह जांच अधिकारी को तलब करने के पक्ष में था, लेकिन फिलहाल अंतिम अवसर दिया जा रहा है।
मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी, जहां अदालत यह देखेगी कि उसके निर्देशों का कितना पालन हुआ।
यह मामला न सिर्फ एक व्यक्तिगत शिकायत तक सीमित है, बल्कि यह पुलिस जांच की पारदर्शिता और घृणा अपराधों के प्रति कानून के लागू होने की गंभीरता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती यह संकेत देती है कि ऐसे मामलों में लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
