मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

मऊ :जनपद की सियासत में विरासत,रिश्ते और विकास की जुबानी जंग तेज।।||Mau:The political battle over heritage, relationships, and development intensifies in the district.||

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मऊ :
जनपद की सियासत में विरासत,रिश्ते और विकास की जुबानी जंग तेज।।
●विरासत में मिली कोर्ट की तारीखें और जेल की सलाखें’ बनाम‘नई राजनीति का दावा।
।।देवेन्द्र कुशवाहा।।
दो टूक : मऊ जनपद के सियासत में शब्द कभी सिर्फ शब्द नहीं होते। उनके पीछे राजनीतिक मंशा, पुरानी यादें, पारिवारिक रिश्ते और भविष्य की संभावनाएं छिपी होती हैं। मऊ की राजनीति में इन दिनों विधायक अब्बास अंसारी और भाजयुमो के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य शक्ति सिंह के बीच जारी बयानबाजी इसी सियासी शतरंज की एक नई चाल है। एक तरफ पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी अब्बास अंसारी हैं, तो दूसरी ओर भाजपा की युवा राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे शक्ति सिंह। दोनों युवा चेहरे हैं, दोनों का अपना राजनीतिक प्रभाव है और दोनों के बयानों ने मऊ की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।
लेकिन सवाल यह है कि यह बहस मऊ के भविष्य की दिशा तय करेगी या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के शोर में जनता के असली सवाल कहीं पीछे छूट जाएंगे?
रिश्तों की दुहाई और सियासत का जवाब
विवाद की शुरुआत तब हुई, जब पत्रकारों ने शक्ति सिंह के मऊ की राजनीति में बढ़ते प्रभाव को लेकर अब्बास अंसारी से सवाल किया। जवाब में अब्बास अंसारी ने शक्ति सिंह को अपना भाई बताते हुए उनके पिता और अपने दिवंगत पिता मुख्तार अंसारी के बीच करीबी संबंधों का जिक्र किया। उनके बयान में रिश्तों की याद भी थी और राजनीतिक तंज भी।
इसके बाद शक्ति सिंह ने 25 अक्टूबर को प्रेस वार्ता कर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि यदि अब्बास अंसारी ने मऊ की जनता के साथ उतने मजबूत रिश्ते बनाए होते, तो उन्हें यहां के नेताओं के बीच भाई-भतीजे के रिश्ते तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती।
दोनों बयानों के बीच एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या राजनीतिक रिश्तों का मूल्यांकन पारिवारिक निकटता से होगा या जनता के प्रति जवाबदेही से? लोकतंत्र में किसी नेता की असली ताकत उसके पारिवारिक संपर्कों से नहीं, बल्कि उसके काम, जनविश्वास और सार्वजनिक आचरण से तय होनी चाहिए।
पिता की पहचान और पुत्र की जवाबदेही
अब्बास अंसारी के संदर्भ में शक्ति सिंह ने विरासत में कोर्ट की तारीखें और जेल की सलाखें मिलने की टिप्पणी की। यह बयान राजनीतिक रूप से तीखा है, लेकिन इसके पीछे उठने वाला सवाल गंभीर है। क्या किसी राजनीतिक परिवार की विरासत का मूल्यांकन उसके अतीत से होगा या वर्तमान के कामकाज से?
मुख्तार अंसारी का नाम मऊ की राजनीति के साथ लंबे समय तक जुड़ा रहा। उनके राजनीतिक जीवन, आपराधिक मामलों और उनसे जुड़े विवादों ने सार्वजनिक विमर्श में एक गहरी छाप छोड़ी। मगर किसी पिता का अतीत अपने आप पुत्र के अपराध या निर्दोष होने का प्रमाण नहीं बन सकता। किसी भी व्यक्ति के संबंध में आपराधिक आरोपों, न्यायिक कार्यवाही और दोषसिद्धि के बीच अंतर करना कानून के शासन के लिए जरूरी है।
इसीलिए अब्बास अंसारी के राजनीतिक प्रदर्शन का आकलन उनके अपने कार्यकाल, उपलब्धियों, जनता से संवाद और न्यायिक मामलों की प्रमाणित स्थिति के आधार पर होना चाहिए। राजनीतिक कटाक्ष अपनी जगह हैं, लेकिन न्यायिक निष्कर्ष अदालतों का विषय हैं।
दूसरी ओर, मुख्तार अंसारी की राजनीतिक विरासत का बचाव केवल पुराने रिश्तों या जनाधार के हवाले से नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में विरासत सम्मान का आधार हो सकती है, जवाबदेही से छूट का नहीं।
ठेकेदारी, कारोबार और रिश्तों की राजनीति
इस विवाद में शक्ति सिंह के पिता और मुख्तार अंसारी के बीच कथित निकटता का सवाल भी उभरा। शक्ति सिंह के पिता के ठेकेदारी व्यवसाय से जुड़े होने की चर्चा के बीच यह तर्क दिया गया कि किसी कारोबारी का किसी जनप्रतिनिधि से संपर्क होना अपने आप में गलत नहीं है।
यह बात अपने मूल रूप में सही है। लोकतंत्र में व्यापारी, ठेकेदार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक जनप्रतिनिधियों से संपर्क रखते हैं। किसी व्यक्ति के व्यवसाय, जमीन या पारिवारिक संबंधों के आधार पर उसके चरित्र पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी कारोबारी और जनप्रतिनिधि के संबंधों पर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब व्यक्तिगत तंज से नहीं, बल्कि प्रमाणों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। क्या किसी ठेके में नियमों का पालन हुआ? क्या किसी कारोबारी को अनुचित लाभ मिला? क्या सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल निष्पक्ष तरीके से हुआ? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर दस्तावेज और जांच दे सकते हैं, महज रिश्तों की व्याख्या नहीं।
इसलिए न तो निकटता अपने आप अपराध का प्रमाण है और न ही कारोबार का संवैधानिक होना हर संभावित सवाल से मुक्ति का आधार।
2005 के दंगे: मऊ की स्मृति और राजनीति की जिम्मेदारी
मऊ की राजनीति पर चर्चा हो और वर्ष 2005 के सांप्रदायिक दंगों का संदर्भ न आए, ऐसा संभव नहीं। उस दौर की हिंसा, भय और सामाजिक तनाव ने शहर के जनजीवन पर गहरी छाप छोड़ी। जिन परिवारों ने हिंसा का सामना किया, जिन लोगों की आजीविका प्रभावित हुई और जिनके मन में असुरक्षा बैठ गई, उनके अनुभव किसी राजनीतिक बयान से छोटे नहीं हो सकते।
शक्ति सिंह ने अपनी प्रेस वार्ता में उस दौर का उल्लेख करते हुए मुख्तार अंसारी की भूमिका और छवि पर सवाल उठाए। ऐसे आरोपों का मूल्यांकन उपलब्ध प्रमाणों और न्यायिक अभिलेखों के आधार पर होना चाहिए। किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करना भावनात्मक आरोपों से नहीं, तथ्यों से संभव है।
फिर भी, दंगों की स्मृति को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित करना पीड़ितों के साथ अन्याय होगा। मऊ को यह सुनिश्चित करना होगा कि धर्म और जाति की पहचान के आधार पर नफरत की राजनीति को बढ़ावा न मिले। हिंसा की पीड़ा को राजनीतिक लाभ का साधन बनाने के बजाय उससे सबक लिया जाना चाहिए।
मऊ का असली सवाल: विकास किसकी प्राथमिकता है?
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विकास है। आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच मऊ के नागरिकों को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि उनके क्षेत्र में सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति क्या है।
क्या जनप्रतिनिधियों ने अपने कार्यकाल में घोषित योजनाओं को जमीन पर उतारा? क्या युवाओं को रोजगार के अवसर मिले? क्या व्यापारियों को सुरक्षित माहौल मिला? क्या नागरिकों को बिना सिफारिश सरकारी सेवाएं उपलब्ध हुईं? क्या सांप्रदायिक सद्भाव को मजबूत करने के लिए ठोस प्रयास हुए?
इन सवालों का जवाब किसी नेता के उपनाम, परिवार या राजनीतिक मंच से नहीं मिलेगा। इसका जवाब विकास कार्यों, बजट के उपयोग, सरकारी आंकड़ों और जनता के अनुभवों से मिलेगा।
यह भी मानना होगा कि लोकतंत्र में मतदाता किसी उम्मीदवार को चुनता है तो उसका चुनावी निर्णय सम्मान के योग्य है। लेकिन चुनाव जीतना किसी जनप्रतिनिधि को आलोचना से परे नहीं कर देता। जनता का जनादेश अधिकार देता है, साथ ही जिम्मेदारी भी सौंपता है।
मऊ की राजनीति में जाति और धर्म की पहचान का प्रभाव हो सकता है, लेकिन यह मान लेना कि किसी पूरे समुदाय को विकास से कोई सरोकार नहीं, स्वयं लोकतांत्रिक सोच को कमजोर करता है। हर समुदाय में ऐसे लोग हैं जो रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और बेहतर भविष्य चाहते हैं। राजनीति का दायित्व इन आकांक्षाओं को दिशा देना है, उन्हें पहचान की खांचों में बांटना नहीं।
सूरज-चांद की दूरी और सियासी मैदान की हकीकत
शक्ति सिंह ने अपने और अब्बास अंसारी के परिवारों के बीच सूरज और चांद जैसी दूरी होने की बात कही। यह राजनीतिक भाषा का एक प्रभावशाली रूपक जरूर है, लेकिन राजनीति में दूरी का दावा करना और अपने आचरण से अलग पहचान स्थापित करना दो अलग बातें हैं।
अब्बास अंसारी ने रिश्तों का संदर्भ देकर राजनीतिक बातचीत शुरू की और शक्ति सिंह ने उसका जवाब देते हुए विरासत, विकास तथा 2005 के दंगों का मुद्दा उठाया। इस तरह दोनों नेताओं की बयानबाजी अब केवल व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं रही, बल्कि मऊ की राजनीतिक स्मृति और भविष्य की बहस में बदल गई है।
हालांकि, इस बहस का वास्तविक परिणाम इस बात से तय नहीं होगा कि किसने अधिक तीखा वाक्य कहा या किसने किसे राजनीतिक रूप से घेर लिया। असली कसौटी यह होगी कि कौन जनता के सवालों का अधिक ठोस जवाब देता है, कौन अपने दावों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करता है और कौन विकास के मुद्दों पर स्पष्ट कार्ययोजना सामने रखता है।
निष्कर्ष: सियासत की जीत नहीं, जनता की जीत जरूरी
मऊ की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुरानी विरासत और नई राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं आमने-सामने दिखाई दे रही हैं। अब्बास अंसारी के लिए चुनौती है कि वे अपनी राजनीतिक पहचान को पारिवारिक इतिहास से आगे बढ़ाकर जनहित के कामों से मजबूत करें। शक्ति सिंह के लिए चुनौती है कि वे अपने राजनीतिक दावों को केवल विरोध और आलोचना तक सीमित न रखें, बल्कि मऊ के विकास का ठोस विकल्प भी प्रस्तुत करें।
जनता को भी यह समझना होगा कि राजनीतिक बयान सुर्खियां बनाते हैं, लेकिन शहर की तकदीर नारे नहीं, नीतियां बदलती हैं। किसी की विरासत को बिना जांचे महिमामंडित करना उचित नहीं और किसी पर आरोप लगाकर उसे दोषी मान लेना भी न्यायसंगत नहीं।
मऊ को अब रिश्तों की राजनीति से आगे बढ़कर जवाबदेही की राजनीति चाहिए। ऐसी राजनीति, जहां पहचान से पहले इंसान, आरोपों से पहले प्रमाण और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से पहले जनहित को महत्व मिले।
क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि किसे विरासत में क्या मिला, बल्कि यह है कि मऊ की जनता को अपने वर्तमान में क्या मिला और भविष्य में क्या मिलने वाला है। यही वह कसौटी है जिस पर हर नेता, हर दल और हर राजनीतिक दावे को परखा जाना चाहिए।