रविवार, 21 जून 2026

लखनऊ :न्याय पर दोहरे मापदंडों का सवाल: भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद उठी बहस।||Lucknow:The question of double standards in justice: a debate that arose after the Bharat Tiwari encounter.||

शेयर करें:
लखनऊ :
न्याय पर दोहरे मापदंडों का सवाल: भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद उठी बहस।
।।देवेन्द्र कुशवाहा ।।
दो टूक : बिहार में भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर के बाद प्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में नई बहस छिड़ गई है। घटना के विरोध में लोगों का आक्रोश शोशल मिडिया व सड़कों पर दिखाई दे रहा है। परिजनों और समर्थकों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
इस घटना ने एक बार फिर देश में एनकाउंटर की वैधता और पुलिस की भूमिका को लेकर बहस को तेज कर दिया है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को अपराधी मान लेने मात्र से पुलिस को उसकी जान लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। लोकतंत्र में न्याय का अधिकार अदालतों और संविधान के दायरे में तय होता है, न कि सड़क या बंदूक के दम पर।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा सवाल भी सामने आया है। समाज का एक वर्ग यह पूछ रहा है कि जब अन्य राज्यों में किसी दलित, पिछड़े वर्ग या अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के एनकाउंटर की खबर आती है, तब अक्सर वही लोग चुप्पी साध लेते हैं जो आज न्याय की मांग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोग ऐसे मामलों में पुलिस कार्रवाई का खुलकर समर्थन भी करते दिखाई देते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी भी एनकाउंटर को गलत माना जाता है, तो उसका विरोध हर परिस्थिति में होना चाहिए, चाहे पीड़ित किसी भी जाति, धर्म या सामाजिक वर्ग से संबंध रखता हो। न्याय का सिद्धांत सभी नागरिकों के लिए समान होना चाहिए और संवेदनशीलता भी किसी पहचान के आधार पर नहीं बदलनी चाहिए।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि कानून के राज में अंतिम फैसला अदालत का होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप हैं, तो उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। बिना न्यायिक प्रक्रिया के किसी की जान जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या समाज और राजनीति को न्याय के मुद्दे पर समान मानदंड अपनाने की आवश्यकता है। फिलहाल पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और सच्चाई सामने आने की मांग लगातार तेज होती जा रही है।